मैंने चारों ओऱ ,
खिची है एक परिधि ,
उम्र की ,
जो शायद पहली बार हुआ हो ,
किसी कविता का हिस्सा।
अनुमति नहीं लाँघ जाये,
हाँ
दरवाजे पर ,
शर्म भी है ,
पलके झुकाये ,
सुरभित होता है सुमन ,
मनुहार कि भी अनोखी प्रथा है..
स्वप्न टहलते है,
फिर,
मिलकर बिछड़ना,
आँसू का बहना ,
शून्य भर जाता है।
मगर उम्र और शर्म
अपने परिधि से बहार
नहीं निकल पाते।
………निवेदिता
गुरुवार, 23 जनवरी 2014
भावार्थ
आजादी के मायने,
नीले आसमान में
ये उडते हुए परिंदे
नहीं बता पाएंगे।
उनका जो दर्द
पिंजरे में कैद
पंछी जान पाएंगे।
सुभाष ने भी ऎसी ही,
पीड़ा को सहा था।
और तभी उसने
"तुम मुझे खून दो
मै तुम्हे आजादी दूंगा "
यह बात कहा था। ………
....... अपराजिता
मंगलवार, 21 जनवरी 2014
चलो छोटू गाँव चलें
चलो छोटू गाँव चलें दादी एक कहानी सुना रही थी बीच में तोता मैनां का नाम ला रही थी छोटू पूछ ही बैठी हमने देखा नहीं... करती हूँ सर्च गूगल में माँ बीच में बोल बैठी शहर की क़िस्मत तौल बैठी सासूमाँ,चिड़ियाँघर चलें दादी फिर उदास बोली चलो छोटू गाँव चलें ...........