शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

परिधि

मैंने चारों ओऱ ,
खिची है एक परिधि ,
उम्र की ,
जो शायद  पहली बार हुआ हो ,
किसी कविता का हिस्सा।
अनुमति नहीं लाँघ जाये,
हाँ
दरवाजे पर ,
शर्म भी है ,
पलके झुकाये ,
सुरभित होता है सुमन ,
मनुहार कि भी अनोखी प्रथा है.. 
स्वप्न टहलते है,
फिर,
 मिलकर बिछड़ना,
आँसू का बहना ,
शून्य भर जाता है।
मगर उम्र और शर्म
अपने परिधि से बहार
नहीं निकल पाते।

………निवेदिता 

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