दोस्ती
शुक्रवार, 24 जनवरी 2014
खामोश
जाने क्या अदा है तुममे,
खामोश रहकर भी .
हर बात कह जाते हो .
तेरी अनकही बातो,
को समझने के लिए,
हम चाह कर भी,
अपने धड़कन को ,
खामोश नहीं कर पाते है।
...…
अपराजिता
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें