कहाँ हो तुम ,
ठहरो न,
मै जानती हू ,
तुम ठहर गए होगे।
मन की बाते ,
मन के तारो से,
संचारित हो,
तुम तक,
पहुँच ही जाती हैं। ………
……… अपराजिता
ठहरो न,
मै जानती हू ,
तुम ठहर गए होगे।
मन की बाते ,
मन के तारो से,
संचारित हो,
तुम तक,
पहुँच ही जाती हैं। ………
……… अपराजिता
नई सोच के साथ बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...
जवाब देंहटाएंSanjay bhaskar
http://sanjaybhaskar.blogspot.in