दोस्ती
गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014
गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014
दोस्ती
तुम मुझे ख़ुशी नहीं ,
गम ही दे देना ,
ज्यादा नहीं अपनी श्रद्धा,
कम ही दे देना,
पर साथ चलना मेरे उन ,
उबड़ खाबड़ रास्तो पर,
तन से ना सही,
मन से ही ,
मैं जब अँधेरे में डरने लगु,
तो विश्वास दिलाना ,
रौशनी आयेगी ,
जब गम के बादल
घिर आये,
तो यकीन दिलाना ,
सूरज फिर से निकलेगा
खुशियाँ फिर से,
जिन्दगी मे आयेगी।
बस
इतना ही चाहिए
मुझे तुम्हारी दोस्ती से
अपराजिता
गम ही दे देना ,
ज्यादा नहीं अपनी श्रद्धा,
कम ही दे देना,
पर साथ चलना मेरे उन ,
उबड़ खाबड़ रास्तो पर,
तन से ना सही,
मन से ही ,
मैं जब अँधेरे में डरने लगु,
तो विश्वास दिलाना ,
रौशनी आयेगी ,
जब गम के बादल
घिर आये,
तो यकीन दिलाना ,
सूरज फिर से निकलेगा
खुशियाँ फिर से,
जिन्दगी मे आयेगी।
बस
इतना ही चाहिए
मुझे तुम्हारी दोस्ती से
अपराजिता
मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014
एक सच
मैं
अब प्यार के मौन पर,
नहीं करती यक़ीं,
सुनना,
बोलना,
समझना,
क्योंकि......
वक़्त नहीं,
वर्षों ,
इन्तज़ार के बाद,
तुम,
सजीव,
फिर कैसे,
मैं सहूँ,
तुम्हारी
चुप्पी !!!!
............निवेदिता
गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014
बेटी
आँखे बंद थी ,
गहरी नींद ,
न सुगबुगाहट ,
अचानक,
स्वप्न शरू था ...
गुलाबी फॉर्क,
सफ़ेद थी जूही की कली,
फुदक फुदक ,
कौन हो ,
परी हो ,
या देवपुत्री ,
ढेरो खिलौने इर्द गिर्द ,
माटी से खेलती ,
साथ में बच्चे छोटे छोटे ,
सखा सहेली ,
पैरो में पायल ,
कौन हो ?
भाग खड़ी हुई ।
गुनगुनाते लोरी सी आवाज़ ,
अचानक मुड़ती है .
ठिठकती है ,
माँ, कैसे रूकू ?
मै तो वही हूँ ,
गुड़िया ,
कल ही कोख से भगाया आपने.......।
……निवेदिता
मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014
बंदना

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥
रविवार, 2 फ़रवरी 2014
संचार
कहाँ हो तुम ,
ठहरो न,
मै जानती हू ,
तुम ठहर गए होगे।
मन की बाते ,
मन के तारो से,
संचारित हो,
तुम तक,
पहुँच ही जाती हैं। ………
……… अपराजिता
ठहरो न,
मै जानती हू ,
तुम ठहर गए होगे।
मन की बाते ,
मन के तारो से,
संचारित हो,
तुम तक,
पहुँच ही जाती हैं। ………
……… अपराजिता
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