आँखे बंद थी ,
गहरी नींद ,
न सुगबुगाहट ,
अचानक,
स्वप्न शरू था ...
गुलाबी फॉर्क,
सफ़ेद थी जूही की कली,
फुदक फुदक ,
कौन हो ,
परी हो ,
या देवपुत्री ,
ढेरो खिलौने इर्द गिर्द ,
माटी से खेलती ,
साथ में बच्चे छोटे छोटे ,
सखा सहेली ,
पैरो में पायल ,
कौन हो ?
भाग खड़ी हुई ।
गुनगुनाते लोरी सी आवाज़ ,
अचानक मुड़ती है .
ठिठकती है ,
माँ, कैसे रूकू ?
मै तो वही हूँ ,
गुड़िया ,
कल ही कोख से भगाया आपने.......।
……निवेदिता
अनुपम भाव संयोजन .... बहुत ही अच्छी प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंमार्मिक ... माँ की मजबूरी या समाज का कठोर सत्य ...
जवाब देंहटाएंsamajik vidambna ko bahut hi gambhirta se chitrit kiya hai aapne!
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