गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

शिव शंभू स्वम्भू


शिव शंभू स्वम्भू,
तांडव नर्तक तू।

 शिव शंभू स्वम्भू,
गंगधारक तू।

शिव शंभू स्वम्भू,
कामदेव भस्मक  तू।

शिव शंभू स्वम्भू,
शक्ति उद्भव करक तू।

शिव शंभू स्वम्भू ,
दक्ष विनाशक  तू।


शिव शंभू स्वम्भू,
गरल समहाक तू।

 शिव शंभू स्वम्भू,
दैत्य संहारक तू।

शिव शंभू स्वम्भू,
मम् जनक भी तू।

………… अपराजिता 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

दोस्ती

तुम मुझे ख़ुशी नहीं ,
गम ही दे देना ,
ज्यादा नहीं अपनी श्रद्धा,
कम ही दे देना,
पर साथ चलना मेरे उन ,
उबड़ खाबड़ रास्तो पर,
तन से ना  सही,
मन से ही ,
मैं जब अँधेरे में डरने लगु,
तो विश्वास दिलाना ,
रौशनी आयेगी ,
जब गम के बादल
घिर आये,
तो यकीन दिलाना ,
सूरज फिर से निकलेगा
खुशियाँ फिर से,
जिन्दगी मे  आयेगी।
बस
इतना ही चाहिए
मुझे तुम्हारी दोस्ती से
 

 अपराजिता 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

एक सच

 
मैं
अब प्यार के मौन पर,
नहीं करती यक़ीं,
सुनना,
बोलना,
समझना,
क्योंकि......
वक़्त नहीं,
वर्षों ,
इन्तज़ार के बाद,
तुम,
सजीव,
फिर कैसे,
मैं सहूँ,
तुम्हारी
चुप्पी !!!!

............निवेदिता 

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

बेटी


आँखे बंद थी ,
गहरी नींद ,
न सुगबुगाहट ,
अचानक,
स्वप्न शरू था ...
गुलाबी फॉर्क, 
सफ़ेद थी जूही की कली,
फुदक फुदक ,
कौन हो ,
परी हो ,
या देवपुत्री ,
ढेरो खिलौने इर्द गिर्द ,
माटी से खेलती ,
साथ में बच्चे छोटे छोटे ,
सखा सहेली ,
पैरो में पायल ,
कौन हो ?
भाग खड़ी हुई । 
गुनगुनाते लोरी सी आवाज़ ,
अचानक मुड़ती है .
ठिठकती है ,
माँ, कैसे रूकू ?
मै तो वही हूँ ,
गुड़िया ,
कल ही कोख से भगाया आपने.......।

……निवेदिता

 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

बंदना


                                             






या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

संचार

कहाँ हो तुम ,
ठहरो न,
मै जानती हू ,
तुम ठहर गए होगे।
मन की बाते ,
मन के तारो से,
संचारित हो,
तुम तक,
पहुँच ही जाती हैं। ………


……… अपराजिता 

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

खामोश

जाने क्या अदा है  तुममे,
 खामोश रहकर भी .
 हर बात कह जाते हो  .
 तेरी अनकही बातो,
 को समझने के लिए,
 हम चाह कर भी,
 अपने धड़कन  को ,
 खामोश नहीं कर पाते है। 
 
...…अपराजिता 
परिधि

मैंने चारों ओऱ ,
खिची है एक परिधि ,
उम्र की ,
जो शायद  पहली बार हुआ हो ,
किसी कविता का हिस्सा।
अनुमति नहीं लाँघ जाये,
हाँ
दरवाजे पर ,
शर्म भी है ,
पलके झुकाये ,
सुरभित होता है सुमन ,
मनुहार कि भी अनोखी प्रथा है.. 
स्वप्न टहलते है,
फिर,
 मिलकर बिछड़ना,
आँसू का बहना ,
शून्य भर जाता है।
मगर उम्र और शर्म
अपने परिधि से बहार
नहीं निकल पाते।

………निवेदिता 

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

भावार्थ

आजादी के मायने,
नीले आसमान में
ये उडते हुए परिंदे
नहीं बता पाएंगे।
उनका जो दर्द
पिंजरे में कैद
पंछी जान पाएंगे।
सुभाष ने भी ऎसी  ही,
पीड़ा को सहा था।
और तभी उसने
"तुम मुझे खून दो
मै  तुम्हे आजादी दूंगा "
यह बात कहा था। ………

....... अपराजिता
 

मंगलवार, 21 जनवरी 2014


 चलो छोटू गाँव चलें

चलो छोटू गाँव चलें
दादी एक कहानी सुना रही थी
बीच में तोता मैनां का नाम ला रही थी
छोटू पूछ ही बैठी
हमने देखा नहीं...
करती हूँ सर्च गूगल में
माँ बीच में बोल बैठी
शहर की क़िस्मत तौल बैठी
सासूमाँ,चिड़ियाँघर चलें
दादी फिर उदास बोली
 
चलो छोटू गाँव चलें ...........


……निवेदिता 
ॐ गुरुवे नमः।